गुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने के उपाय | शुभ/अशुभ प्रभाव

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गुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने के उपाय | शुभ/अशुभ प्रभाव

निम्नलिखित गुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने के उपाय बहुत प्रभावशाली है। कुदरती टोटके जो मनुष्य पढ़कर खुद करेगा उसी का कार्य पूर्ण होगा और जो दूसरे को पढ़कर बतायेगा जिसको बतायेगा उसका कार्य नहीं होगा, जो पढ़ेगा और बिना किसी व्यक्ति को बताये करेगा उसी का कार्य सम्पूर्ण होगा।

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गुरु बृहस्पति को प्रसन्न करने के उपाय

यदि पापी बृहस्पति ग्रह को अनुकूल करने के अचूक उपाय का फल नीच हो रहा हो तो बृहस्पति का फल भी नीच हो जाता है। बाप-दादा या ब्राह्मण का अपमान करने से भी बृहस्पति नीच हो जाता है, यदि बृहस्पति की पहचान है, चोटी के स्थान पर सिर के बाल उड़ जाएं, गले में माला डाले रखें, सोना खो जाए या चोरी चला जांए। झूठी अपवाहें फैलें या शिक्षा बन्द हो जाए।

  • मन्दे बृहस्पति से बचने के लिए नदी में तेल, बादाम एवं नारियल प्रवाहित करें।
  • गले में सोना डाले रखें।
  • केसर का तिलक लगाएं, अथवा केसर खाएं।
  • नाक साफ करके काम शुरू करें।
  • बृहस्पति की चीजें; जैसे सोना, पुखराज, कांस्य-पात्र, खांड (चीखी), शुद्ध घी, पीला रंग, चने की दाल, हल्दी या पुस्तक आदि का दान में देना चाहिए 
  • चने की दाल दान धर्म में यकीन रखे 

नोट – बहस्पति की उपरोक्त सभी चीजों की नहीं , बल्कि किसी एक का दान करे

बृहस्पति के अनिष्ट प्रभाव का निवारण

बृहस्पति ग्रह का शुभ और अशुभ प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है। ग्रह के अनिष्ट प्रभाव के कारण व्यक्ति को अनेक प्रकार के गंभीर रोगों का सामना करना पर सकता है तथा आर्थिक क्षेत्र में भी हानि उठानी पड़ती है। अतः ग्रह किसी भी क्षेत्र में अनिष्ट प्रभाव कर रहा हो तो उसका बलबान किया जाना बहुत आवश्यक है।

यदि बृहस्पति अनिष्टकारी हो तो सारे कुल के हर मनुष्य से जहां तक कि रक्त का प्रभाव हो, उन सभ से एक-एक पैसा लेकर धर्म-मंदिर में देने से आपका बृहस्पति आपके अनुकूल हो जाता है ‘दूर होता है। बृहस्पति को प्रसन्‍न करने के लिएं जहा मंदिर में दान देना लाभप्रद है, वहां पीपल के वृक्ष को पालना भी लाभप्रद है। बृहस्पति को दान में दी जाने वाली वस्तुओं में केसर, हल्दी, दाल, चना और सोना भी है।

नोट – वैसे तो बृहस्पति ग्रह से संबंधित देवता ब्रह्माजी हैं, पर यदि बृहस्पति की अनिष्ट स्थिति के कारण पुत्र की प्राप्ति न हो रही हो तो श्री हरि का पूजन करना चाहिए। टोटके

1  प्रतिकूल या अनिष्ट ग्रह बृहस्पति को अनुकूल बनाने के लिए केले की जड़ का टुकड़ा सोने से बने हुए ताबीज ( मादलिया ) में रखकर, सूती के पीले रंग के धागे से बांधकर, बृहस्पतिवार के दिन गले में धारण करना चाहिए।

2 . नई चांदी की अंगूठी को शुद्ध घी, सफेद चंदन व पानी में डुबोकर तर्जनी उंगली में पहननी चाहिए। बृहस्पतिवार के दिन सूर्योद्य के समय यह प्रयोग करें।

बृहस्पति का शुभ/अशुभ प्रभाव

1  बृहस्पति यद्यपि एक शुभ ग्रह है, यदि यह वक्री हो जाए तो शुभता में बहुत वृद्धि करता है, तो भी इसका लग्न का आधिपत्य हो और इस पर पांच पाप प्रभाव पड़ रहे हों तो वे प्रभाव इतना ज्यादा असर रखेंगे कि बृहस्पति का वक्रत्व काम न देगा। ऐसा बृहस्पति लग्नेश ( पहले घर का स्वामी या मालिक ) होकर निर्बल समझा जाएगा और इसी कारण एक निर्बल मस्तिष्क का घोतक होगा। दूसरे शब्दों में ऐसे जातक में बुद्धि का बहुत कम विकास हो पाएगा।

निम्न कुंडली में बृहस्पति आठवें घर में है और  शत्रु राशि में है और उस पर राहु की नवम दृष्टि का प्रभाव है और शनि, बुध तथा शुक्र को उस पर दृष्टि है। इसमें शनि पापी है और राहु अधिष्ठित राशि का स्वामी भी है। दूसरी ओर मंगल और चंद्र भी पापी हैं। यहां शुक्र भी एक पापी ग्रह के रूप में कार्य कर रहा है। जब शुक्र और शनि पापी बन जाएं तो उनके साथ मौजूद बुध भी पापी माना जाएगा।

इस प्रकार बृहस्पति पर तीन पापी ग्रहों शनि, शुक्र और बुध का भी प्रभाव है। अर्थात्‌ कुंडली में बृहस्णति पर छह पाप प्रभाव देखने में आए और यही कारण है कि वक्री होता हुआ भी बृहस्पति यहां अनिष्ट फल प्रदान कर रहा है। उपाय के संदर्भ में स्पष्ट है कि बृहस्पति को बलवान्‌ किया जाना चाहिए और इसके लिए पीले रंग का पुखराज धारण करना श्रेष्ठ है।

2  बृहस्पति का पेट से भी विशेष संबंध है। पाचनशक्ति इस ग्रह के अधीन बहुत हद तक है। यदि यह ग्रह पांचवें घर के स्वामी के साथ-साथशनि की दृष्टि में हो तो पेट में गैस (वायु) का रोग होता है। निम्न कुंडलीमें पांचवें घर का स्वामी और पेट का कारक बृहस्पति दोनों इकट्ठे हैं, साथमें शुक्र है और वो भी सूर्य लग्न से पंचमेश है। इन सब पेट के द्योतक ग्रहोंघर शनि कौ पूर्ण तृतीय दृष्टि पड़ रही है और फिर शनि चूंकि सूर्य औरकेतु अधिष्ठित राशि का स्वामी है, इसमें केतु तथा सूर्य का पाप प्रभाव भीशामिल है।

इस प्रकार जहां पीड़ित होने वाले ग्रह लग्न, चंद्र लग्न और सूर्य लग्न से पंचमेश होने के कारण पेट के द्योतक हैं, वहां पीड़ित करने वाला ग्रह भीबहुत क्रूर है। फल बहुत देर तक पेट में कष्ट ! गैस इसलिए कि शनि काप्रभाव मुख्य है, वो वायु ग्रह है। इसके उपाय स्वरूप अनिष्ट ग्रहों को पीलापुखराज धारण करके बलवान बनाना चाहिए। तथा पीड़ा देने वाले ग्रहों कोशांत करने के लिए व्रत, दान: और जाप आदि की प्रक्रिया करनी चाहिए।

कुछ खास जानकारियाँ

जब बृहस्पति पर अशुभ असर पड़ता है, तो वह अपना संकट केतु पर डाल देता है। उदाहरण के लिए, बृहस्पति पांचवें घर में हो और केतु किसी दूसरे घर में हो, ऐसे में यदि बृहस्पति की बुरी दिशा आ जाए तो केतु के छठे घर का फल अहितकर हो जाएगा तो, चन्द्र और मंगल ( मित्र ग्रहों ) का संग होने पर बृहस्पति अधिक बलवान हो जाता है। जिस तरह वायु को कहीं भी आने-जाने की अड़चन नहीं होती, उसी तरह बृहस्पति को भी ब्रह्माण्ड में किसी भी जगह भी आने-जाने से कोई नहीं रोक सकता, इसलिए बृहस्पति को कुल ब्रह्माण्ड का मालिक माना गया है।

इसलिए बृहस्पति को कुल ब्रह्माण्ड का मालिक माना गया है। ज्योतिष में पुत्र-सुख के पहले बृहस्पति को देखा जाता है, चन्द्र का साथ होने पर बृहस्पति की ताकत बढ़ जाती है, हालात मंगल के साथ भी यही हैं, जबकि सूर्य मजबूत होने पर जातक की मान-प्रतिष्ठा बढ़ती है, बृहस्पति मान, सम्मान, प्रतिष्ठा और उत्पत्ति आदि की भंडार है, परंतु कमजोर होने पर उसकी तमाम खासियतें समाप्त हो जाती हैं।

देव गुरु बृहस्पति के माता पिता कौन थे

बृहस्पति को महर्षि अंगिरा का बेटा कहा जाता है तथा पुराणों में महर्षि की गणना सप्तऋषियों में की जाती है। बृहस्पति की माता श्रध्दा, कर्दम ऋषि की पुत्री थी। बृहस्पति को देवताओं का गुरु माना जाता है। बृहस्पति अन्य ग्रहों की अपेक्षा अधिक बलशाली, कोमल वृत्ति बाला, ज्ञान का प्रदाता तथा शुभ ग्रह

है। धनु और मीन राशि का यह स्वामी है। सूर्य, चंद्रमा और मंगल यह तीनो इसके अच्छे मित्र हैं, परंतु शनि, राहु और केतु ग्रह मित्र या शत्रुता के पचड़े में नहीं पड़ते! वो बृहस्पति के न तो मित्र हैं और न ही उससे किसी प्रकार की शत्रुता ही रखते हैं। बृहस्पति के मामले में जो सामान्य बने रहते हैं, किन्तु बुध और शुक्र उससे पक्की शत्रुता रखते हैं। इसका कारण यह है कि वो बृहस्पति कौ शक्ति को स्वीकार नहीं करते।

बृहस्पति ग्रह के शुभ और अशुभ घर कौन-कौन से हैं

बृहस्पति स्त्रियों का भाग्यशाली तथा औलाद सुख का कारक ग्रह है। हल्दी,धनिया,प्याज,ऊन तथा मोम आदि का प्रतिनिधि भी बृहस्पति ही है। इसका अशुभ प्रभाव होने के कारण प्रत्येक कार्य में व्यवधान तथा असफलता ही हाथ लगती है। समाज, परिवार तथा बंधुओं के बीच आदर नहीं होता। विद्या प्राप्त करने में भी अनेक प्रकार की बाधाएं आती हैं। शुभ तथा बलवान बृहस्पति परमार्थी, चतुर, कोमल मति, विज्ञान का विशेषज्ञ न्याय, धर्म नीति का जानकार,

सात्त्विक वृत्ति से युक्त तथा दौलतमंद बनाता है। समाज में प्रतिष्ठा और कीर्ति को बढ़ाता है। पुरुषों को संतान का सुख मिलता है और स्त्रियों का वैवाहिक जीवन अच्छा वेतित होता है, और उनके सौभाग्य भी खंडित नहीं होने देता। जन्मकुंडली में बृहस्पति के 1/2/4/5/9/11/12  घर शुभ और 3/6/7/8/10  घर अशुभ हैं।

बृहस्पति जब मिथुन राशि में आता तो कैसा फल देता है

बृहस्पति जब मिथुन राशि में आता है, तो अव्यवस्था फैला देता है,अप्रत्याशित घटनाएं घटती हैं। यदि उसके सामने धनु राशि में शनि हो तो उत्पाद दिखाई पड़ते हैं। बृहस्पति के मित्र सूर्य-चन्द्र अच्छी हालत में न हों तो जातक का भाग्य सोया रहता है। यदि बृहस्पति बुध-शुक्र शत्रु ग्रह में चला जाए तो बुरा फल देता है। राहु, केतु और शनि के साथ भी बृहस्पति मन्दा हो जाता है। जब बृहस्पति मन्दा हो तो पुत्र पर उसका बुरा असर पड़ता है।

देव गुरु बृहस्पति के बारे में कुछ अन्य जानकारी

बृहस्पति जन्मकुंडली के पांचवें घर का कारक है। अकेला लग्नस्थ बृहस्पति जातक के लाखों दोषों को दूर कर देता है। यह चंद्र और सूर्य की तरह सदा मार्गीा नहीं होता, बल्कि समय-समय पर मार्गी, वक्री तथा अस्त, होता रहता है। यह जन्मकुंडली के जिस घर में भी मौजूद रहता है, वहाँ से तीसरे तथा दसवें घर को एक चरण दृष्टि से, पांचवें और नौवें घर को दो चरण दृष्टि से और चौथे तथा आठवें घर को तीन चरण दृष्टि से और सातवें, पांचवे,नौवें घर को पूरी दृष्टि से देखता है।

जिस प्रकार सूर्य को आत्मा का करक और चंद्रमा को मन का कारक माना जाता है, उसी तरह बृहस्पति को शरीर कौ शक्ति और ज्ञान का कारक माना गया है। जन्मकुंडली में बृहस्पति शुभ घर में मौजूद हो और किसी पापी ग्रह की दृष्टि उस घर न पड़ रही हो तो विद्या-बुद्धि से संपन्न, सम्मानपूर्ण जीवन बिताने वाला बनता है। बृहस्पति से धन, ऐश्वर्य, समृद्धि, संपत्ति, न्याय, संतान (पुत्र), स्वर्ग का सुख तथा अध्यात्म का’ विचार किया जाता है। जिस जातक की जन्मकुंडली में बृहस्पति शुभ घर में मौजूद हो, उसे निश्चित रूप-से एक राजा के समान सुख देता है।

अगर बृहस्पति की स्थिति आपके विपरीत हो अथवा दोषपूर्ण हो तो नाक, कान, ‘गले और नजले का कारण अवस्य बनेगा तथा दिल की रोग, टीबी, बेहोशी, सूजन और बलगम आदि बीमारियों को प्रभावित करेगा। शरीर में कमर से लेकर जंघा तक इसका प्रभाव क्षेत्र माना गया है। यह सूर्य के साथ सात्त्विक, चंद्र के साथ राजसी और मंगल के साथ तामसी व्यवहार करता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर बृहस्पति कांस्य धातु, दाल, चना, गेहूं, जौ, घी, पीत वस्त्र तथा मीठे रसीले पदार्थों का अधिपतित्त्व करता है।

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